चुनावी रणक्षेत्र में उतरने से पहले ही हाफ रहे है दयालदास

ए. एन. द्विवेदी
रायपुर। नवागढ़ विधानसभा क्षेत्र के विधायक व डॉ. रमन सरकार के संस्कृति मंत्री दयालदास बघेल ऐसे चेहरे हैं जो बहती गंगा में हाथ धोकर तीन बार विधानसभा चुनाव जीतने में सफल रहे। वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव को छोड़ पिछले दो बार के चुनाव में उनके समक्ष कांग्रेस का प्रत्याशी कमजोर रहा। इसके चलते वे जीत कर अजेय बने हुए हैं, लेकिन इस बार ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा है। उन्हें कांग्रेस व बसपा के साथ भाजपा के मोर्चे से भी जूझना पड़ रहा है। पहली लड़ाई उनको अपनी ही पार्टी के नेताओं से लडऩी पड़ रही है। सियासी रार के चलते उनकी टिकट पर रोड़ा अटका दिया गया है। सूबे की भाजपाई राजनीति में यह सबको पता है कि इन दिनों सरोज पांडे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की काफी करीबी हैं। उनकी बात दिल्ली-दरबार में सुनी जा रही है। इससे वाकिफ दयालदास चुनाव मैदान में उतरने के पहले ही हांफ रहे हैं। जबकि कांग्रेस ने अभी अपने प्रत्याशी के पत्ते नहीं खोले है। वे हांफ क्यों रहे हैं? इसका सियासी पेंच है, हार का रार यानी बदला। राज्यसभा सांसद सरोज पांडे वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव हार गईं। तब कथित रूप से हार के पीछे दयालदास बघेल का भी हाथ होना बताया गया था। सूत्र बताते हैं कि इस संबंध में सरोज पांडे का मानना है कि दयालदास बघेल ने उनके खिलाफ काम किया। इसका बदला वे अब मौका आने पर भुना रही हैं। दयालदास के करीबियों का मानना है कि सरोज पांडे उनसे राजनीतिक बदला लेने उनकी टिकट अटका रहीं हैं। सच क्या है, यह दयालदास व सरोज पांडे जाने लेकिन राजधानी की सियासी फिजां में यह बात तैर रही है। बुधवार को एकात्म परिसर में साजा विधानसभा क्षेत्र के विधायक लाभचंद बाफना के खिलाफ भाजपाइयों के हल्लाबोल के पीछे भी सरोज पांडे का ही हाथ होना बताया जा रहा है। बहरहाल दयालदास बघेल अपने ही बुने जाल में फंस गए हैं। नवागढ़ विधानसभा क्षेत्र से सरोज पांडे ने अपने गुट से दयाराम बांधे का नाम आगे कर दयालदास बघेल को तगड़ा पटखनी दी है। इससे उनकी दिन की चैन व रात की नींद उड़ गई है। सनद रहे एक दौर था जब सरोज पांडे व दयालदास की गाढ़ी छनती थी। दयालदास को डॉ. रमन सिंह की दूसरी पारी में मंत्री बनवाने में सरोज पांडे का बड़ा हाथ था। तब वे दुर्ग जिले की सियासत में दयालदास बघेल को साध कर लंबी छलांग लगाने की रणनीति पर चल रही थी, लेकिन दयालदास ने मंत्री पद पाने के कुछ बाद ही हाथ झटक दिया था और दोनों नेताओं के सियासी संबंधों पर गांठ पड़ गई। अविभाजित दुर्ग जिले के अन्य विधायकों व नेताओं के साथ भी सरोज का संबंध इसी तरह का रहा है। एक दौर था जब साजा विधानसभा क्षेत्र के विधायक लाभचंद बाफना और सरोज पांडे की बड़ी नजदीकियां थी, आज दूरी इतनी ज्यादा है कि औपचारिकता ही शेष है। इस सूची में चार-पांच और नेताओं के नाम हैं। दरअसल सरोज पांडे भाजपा के विधायकों को गांठ कर प्यादा बनाने में ज्यादा रुचि रखती हैं। आज के दौर में यह किसी भी पार्टी में लंबे काल तक संभव नहीं है। अविभाजित दुर्ग जिले अधिकांश भाजपा नेताओं के साथ उनका पंगा हो चुका है। बहरहाल टिकट के मामले में लाभचंद बाफना के साथ-साथ दयालदास बघेल उनके राडार पर हैं। पिछले करीब छह साल से दोनों नेताओं की पटरी नहीं बैठ रही है। हाल ही में भाजपा ने प्रत्याशी चयन को पारदर्शी व आसान बनाने जिलों में मतदान कराया जिसमें तीन नामों के पैनल पर वोटिंग कराई गई। दयालदास को टिकट की दौड़ से बाहर कराने पूरी चाल चली गई। पहले विरोध कराया फिर ऐेसा पेंच मारा गया कि दयालदास पैनल में नाम के लिए तरस जाए। इसी वजह से दयालदास की टिकट कटने की बात नवागढ़ विधानसभा क्षेत्र में तैर रही है। इसकी कोई काट उनके समझ में नहीं है। इसके बाद भी दयालदास को टिकट मिलने के आसार दिख रहे हैं, दरअसल उनसे मजबूत प्रत्याशी भाजपा के पास नहीं है। बीते पंद्रह वर्षों में दयालदास बघेल ने किसी अन्य नेताओं को आगे बढऩे का मौका नहीं दिया। भाजपा संगठन ने भी इस दिशा में कोई काम नहीं किया। बहरहाल सरोज के दंश से लहुलुहान दयालदास मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के शरण में त्राहिमाम कर रहे हैं। नवागढ़ विधानसभा क्षेत्र में समीकरण में तेजी से बदलाव आ रहा है। इसके चलते दयालदास को टिकट मिल भी गई तो उनकी राह इस बार आसान नहीं है। पहली बात तो यह है कि सरोज पांडे गुट के लोग उनकी राह में अडंगा डाल चुके हैं। ज्ञात हो बेमेतरा जिले के संगठन में सरोज पांडे गुट का वर्चस्व है। इसलिए दयालदास बघेल घबराए हुए हैं। दूसरी बात यह है कि तीन बार की जीत से दयालदास में अहंकार आ गया है। पिछले पांच साल तक उन्होंने अहंकार के चलते न किसी की परवाह की और न ही तवज्जो दी।

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