भूपेश सरकार चली रमन की राह : NHM के संविदा कर्मियों ने मांगा अपना हक, मजबूरी मे आंदोलन की राह पर, सीएमएचओ तानाशाह बर्खास्तगी का दंड

रायपुर!  छत्तीसगढ़ प्रदेश में इन दिनों संविदा में कार्यरत एनएचएम के स्वास्थ्य कर्मी 19 सितंबर से हड़ताल पर चल दिए हैं!  प्रदेश में कार्यरत 13000 संविदा स्वास्थ्य कर्मियों ने 2 साल बीत जाने के बाद यह रास्ता अख्तियार किया है!  संविदा स्वास्थ्य कर्मी सरकार को समय-समय पर उनके घोषणा पत्र में किए गए वादे को याद दिलाते रहे.  लेकिन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बने तकरीबन 2 साल होने को है पर अभी तक संविदा स्वास्थ्य कर्मियों को नियमित नहीं किया गया ना ही संविदा स्वास्थ्य कर्मियों को संविलियन जैसा कोई प्रावधान दिया  गया है। एनएचएम में 10 वर्ष से भी अधिक से संविदा में कर्मचारी काम कर रहे हैं लेकिन उन्हें वेतन के नाम पर महज 10 से ₹12000 दिया जा रहा है । संविदा कर्मचारी लगातार चेतावनी के बाद आंदोलन की राह पर जाने के लिए विवश हो गए हैं । निश्चित ही इसके लिए सरकार ही जिम्मेदार है। कांग्रेस सत्ता में आने से पहले अपने घोषणा पत्र में स्पष्ट किया है कि प्रदेश में कार्यरत सभी संविदा कर्मियों को नियमित करेंगे लेकिन यह वादा  अभी तक नहीं पूरा हुआ  NHM के किसी भी संविदा कर्मियों के परिवार का जोखिम बना हुआ है संविदा स्वास्थ्य कर्मी प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में देवदूत की भूमिका निभाते हैं । जहां पर डाक्टरों की कमी है यह संविदा स्वास्थ्य कर्मी इस महामारी के  साथ-साथ हर काम में अपनी महत्वपर्ण भूमिका निभाते आए हैं। केंद्र तथा राज्य की विभिन्न संचालित योजनाओं का बखूबी निर्वहन करते रहे हैं। लेकिन वेतन में कोई समानता नहीं है ना ही इनके परिवार में किसी को अनुकंपा नियुक्ति देने का प्रावधान है। कोरोना काल के संक्रमण में एक तरफ सरकार एक लाख डाउन की व्यवस्था कर रही है।  ताकि संक्रमण से बचा जा सके ।

वही ये स्वास्थ्य विभाग के ये सिपाही अपने परिवार के लिए चिंतित है संविदा में कार्यरत किसी भी स्वास्थ्य कर्मी की मौत हो जाती है तो उनके परिवार के भरण पोषण में भी संकट उत्पन्न हो जाएगा।  इन परिस्थितियों को देखा जाए तो निश्चित तौर पर इनकी मांगे जायज नजर आती है भले ही समय का चयन सही ना हो । लेकिन इसके लिए राज्य सरकार और उनके अधिकारी ही जिम्मेदार है।  पूर्वर्ती सरकारों में भी दमन की नीति चलती रही है। प्रदेश में डॉक्टर रमन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने संविदा कर्मियों को दमन की खौफ से कुचल दिया था। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत नर्सों को जेल में बंद करवा दिया था । वहीं कई के खिलाफ बर्खास्तगी की तथा निलंबन की कार्यवाही हुई थी। चुनावी साल में लगातार संविदा कर्मचारियों का आक्रोश बढ़ता गया। नतीजा रमन सरकार को मुंह की खानी पड़ी। अब भूपेश सरकार भी उसी रास्ता को अख्तियार कर रही है । तेरा हजार स्वास्थ्य कर्मियों ने भी आंदोलन छेड़ा है जिसका सलूशन निकालने की बजाए सरकार के नुमाइंदे बर्खास्तगी के आदेश का डंडा दिखा रहे हैं। निश्चित ही

सरकार तथा जनता को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। एक तरफ प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा रही है। अस्पतालों में बैड नहीं है। सरकारी तथा गैर सरकारी अस्पताल चारों तरफ फूल है। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में लगे यह कर्मचारी आंदोलन पर है निश्चित ग्रामीणों के लिये सनकथ हो सकता है।

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