भारत अमेरिका व्यापार समझौता देश के किसानों के लिए घातक साबित होगा – शिव कुमार कक्काजी

अमेरिका व चीन के बीच व्यापार युद्ध व अमेरिका में बढ़ते कृषि उत्पादन और घटते कृषि निर्यात की वजह से अमेरिका के कृषि क्षेत्र पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अमेरिका का कृषि क्षेत्र निर्यात पर आधारित है, 2011-13 तक कपास व बादाम उत्पादन का 70 प्रतिशत और गेहूं व चावल का 50 प्रतिशत उत्पादन अमेरिका ने निर्यात किया था। 2018 में अमेरिका का कृषि निर्यात 1% बढ़कर 140 बिलियन डॉलर हो गया, दूसरी तरफ अमेरिका का कृषि आयात 6% बढ़कर 129 बिलियन डॉलर हो गया। इस प्रकार कृषि क्षेत्र में अमेरिका का व्यापारिक मुनाफा मात्र 11 बिलियन डॉलर रह गया जो पिछले 14 साल का सबसे न्यूनतम है। अमेरिका का कृषि निर्यात कम होने की वजह से घरेलू बाजार में कृषि उत्पादों के दाम गिर गए हैं। कृषि निर्यात में वृद्धि करने के लिए अमेरिका ने कोलंबिया, पनामा और दक्षिण कोरिया के साथ नए व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं। इन व्यापारिक समझौतों से अमेरिका के कृषि उत्पादों का निर्यात 2.2 बिलियन डॉलर तक बढ़ने की उम्मीद है।

ऐसी स्थिति में फरवरी माह के अंत में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत के दौरे पर आ रहे हैं और अमेरिका भारत के बीच व्यापारिक समझौता उनके एजेंडे में शीर्ष पर है। अपने कृषि क्षेत्र को बचाने के लिए अमेरिका कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए नए बाजार ढूंढ रहा है। 2019 में अमेरिका ने भारत के साथ जीएसपी करार रद्द कर दिया था जिसके तहत बिना किसी निर्यात शुल्क के भारत 6 बिलियन डॉलर के उत्पाद अमेरिका भेजता था। इसके बदले में भारत ने 28 अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया था। कई प्रतिष्ठित अखबारों में छपी खबरों के अनुसार जीएसपी के तहत दोबारा से छूट देने के लिए अमेरिका भारत के साथ नए व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बना रहा है जिसके तहत लगभग 42000 करोड़ के कृषि उत्पादों का निर्यात अमेरिका से भारत में किया जाएगा।

13 नवम्बर 2019 को भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि रोबर्ट लाइटहाइज़र के बीच मुलाकात हुई थी जिसमें व्यापार समझौते पर शुरुआती चर्चा हुई थी। पिछले साल नवंबर महीने के तीसरे हफ्ते में अमेरिका के व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल ने भारत दौरा किया था जिस दौरान भारत अमेरिका व्यापार समझौते पर विस्तृत चर्चा की गई थी। अगर इस व्यापारिक समझौते पर हस्ताक्षर होते हैं तो दूध उत्पादों, सेब, अखरोट, बादाम, सोयाबीन, गेहूं, मक्का, मुर्गी पालन उत्पादों का आयात बहुत कम आयात शुल्क पर भारत में किया जाएगा जिसके गंभीर दुष्परिणाम भारत के किसानों को झेलने पड़ेंगे।

भारत के किसान अमेरिका के किसानों के साथ मुकाबला नहीं कर सकते हैं। 2014 के कृषि बिल में अमेरिका ने आगामी 10 सालों के लिए सब्सिडी हेतु 956 बिलियन डॉलर की राशि आवंटित की थी। 2019 के कृषि बिल में इस सब्सिडी राशि को बढ़ाकर आगामी 4 वर्षों के लिए 867 बिलियन डॉलर कर दिया। आज केंद्र सरकार ने 2020-21 का बजट पेश करते हुए कृषि, ग्रामीण व सिंचाई के क्षेत्रों को लगभग 40 बिलियन डॉलर (यानि 2.8 लाख करोड़ रुपये) आवंटित किए हैं। तो एक तरफ अमेरिका की सरकार सालाना लगभग 217 बिलियन डॉलर की सब्सिडी अपने किसानों को दे रही है वहीं दूसरी तरफ हमारी सरकार सालाना मात्र 40 बिलियन डॉलर कृषि, ग्रामीण और सिंचाई पर खर्च कर रही है तो स्वभाविक बात है कि हमारा किसान अमेरिका के किसान से मुकाबला नहीं कर सकता है। इसके अलावा अमेरिका में जनसंख्या-भूमि अनुपात भारत के मुकाबले बिल्कुल अलग है। लेखक दया कृष्ण ने अपनी किताब “वैश्वीकरण का स्वदेशी दृष्टिकोण” में लिखा है कि भारत के मुकाबले अमेरिका कृषि इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर 1 लाख गुना ज्यादा खर्च करता है। पूरी दुनिया में अमेरिका सबसे अधिक सब्सिडी अपने किसानों को देता है। विश्व व्यापार संगठन बनने के बाद अमेरिका हर कृषि बिल में अपने किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी में बढ़ोतरी कर रहा है, दूसरी तरफ अन्य विकासशील देशों पर सब्सिडी कम करने का दबाव डाल रहा है। 2006 में विश्व व्यापार संगठन की दोहा वार्ता के दौरान भारत ने सभी विकासशील देशों का नेतृत्व करते हुए अमेरिका की सब्सिडी सम्बन्धी गलत नीतियों का विरोध किया था। अगर अब भारत अपने स्टैंड से पीछे हटकर अमेरिका के कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क कम करता है तो विकासशील देशों के बीच भारत की छवि पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
मैं 1972 से किसानों की लड़ाई लड़ते हुए अनेकों बार जेल गया हूँ। पिछले 47 वर्षों में मैंने इस तरह का किसान विरोधी व्यापार समझौता कभी नहीं देखा, इस तरह के व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करना देश व किसानों के साथ विश्वासघात होगा। एक तरफ केंद्र की मोदी सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने की बात करती है, दूसरी तरफ अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत कर रही है जिसके गंभीर दुष्परिणाम भारतीय किसानों को झेलने पड़ेंगे। मैं माननीय प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन करूँगा कि भारत के करोड़ों किसानों के हितों की रक्षा करने हेतु केंद्र सरकार भारत अमेरिका व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करे।

आलेख ,काक्का जी

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