लोकतंत्र जीत गया अर्थतंत्र हार गया…

Ranjit Pandey

@CGBHARATBHUMINEWS.COM

अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ के 18 साल में यह पहला मौका है जब जनता ने खुद होकर चुनावी मोर्चा संभाला और घमंड से ओतप्रोत भाजपा जैसी नकचढ़ी पार्टी को धूल चटा दिया। भाजपा के कर्णधारों से लेकर गली कूचे के नेताओं को लगता था कि पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है। यहां तक कि जनता को भी। ऐसा करने में वे पिछले दो चुनाव से सफल होते रहे, लेकिन इस बार जनता ने बता दिया कि सौदागरों की फौज नहीं चाहिए। बस इसी के साथ भाजपा को सत्ता से जनता ने ऐसा फेंका मानो दूध से मक्खी। भाजपाई तड़प कर रह गए। इस बार भी भाजपा के रणनीतिकारों ने सोचा कि करोड़ों रुपए मतदाताओं में बांट कर सत्ता की बाजी मार लेंगे, लेकिन उनकी एक न चली। पर्दे के पीछे से नौकरशाहों के दमनात्मक एवं तानाशाही रणनीति से त्रस्त जनता ने उनके पिछले साढ़े चार साल के कृत्यों से आजीज पूरा आक्रोश ईवीएम पर उलेड़ दिया। नतीजा भाजपा सत्ता तो दूर ठीक ढंग से संख्या बल के साथ विपक्ष में बैठने वाली पार्टी भी न बन सकी। जनता ने एक तरह से सूबे भर में भाजपा को खारिज करने का अभियान चला दिया। इसके चलते विधानसभा में भाजपा की ठीक वैसे ही स्थिति दिखने वाली है जैसे अंधड़ के बाद खेतों की फसलें दिखती है। अंधड़ चलने के बाद फसलें लोट जाती हैं, कहीं-कहीं कुछ पौधे खेत में खड़े रह कर किसानों को दिलासा दिलाने की चेष्टा करते हैं। भाजपा के कुछ सदस्य पार्टी की उपस्थिति का बस एहसास कराते रहेंगे। 90 सीटों वाली विधानसभा में 65 सीटें जीतने का मिशन लेकर चलने वाली भाजपा मात्र 15 सीटों तक सिमट गई। अबकी बार रमन सरकार चौथी बार का नारा देने वाली भाजपा की ऐसी दशा आखिर उस कांग्रेस के हाथों कैसे हो गई? जिसे तुच्छ समझ कर सालों से उपहास उड़ाते रहे। तब भाजपा के नेताओं ने प्रकृति के उस नियम को विस्मृत कर दिया, जहां अंधेरा के बाद उजाला आता ही है। भाजपा अपने उजाले से इतरा रही थी जबकि कांग्रेस अंधेरे से निकलने की कोशिश कर रही। अंतत: कांग्रेस के हाथों सुनामी के रूप में उजाले का पदार्पण हुआ। भाजपा में बार-बार की जीत से इतराहट ऐसी बढ़ गई थी मानो अंतकाल तक वे ही राज करते रहेंगे। उनका कोई बाल बांका नहीं कर पाएगा। सूबे की जनता को यह समझ आ रहा था। भाजपाइयों को यह पता होना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है। उनसे परे कुछ नहीं है। इससे भिज्ञ होने के बाद भी भाजपा ने अनभिज्ञता का चरित्र पेश किया। हश्र पराजय के रूप में सामने है। यह तो ही होना था। इसकी बुनियाद करीब साढ़े चार साल पहले जब केंद्र में मोदी युग की शुरुआत के साथ ही रख दी गई थी। मोदी युग में देश भर के भाजपाई खुद को जनता से बड़ा और उनका भाग्य विधाता मानने लगे। वे संवैधानिक संस्थाओं को धता बताते और सियासी मर्यादाओं को रौंदते रहे। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं रहा। जनता पिछले पांच साल से मोदी युग का दंश झेल रही है। उन्हें तो बस विधानसभा चुनाव का इंतजार था। मौका मिला और 15 साल के शासन को एक झटके में समाप्त कर दिया। छत्तीसगढ़ में निवृतमान हो रहे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अगुवाई में सब कुछ ठीक चल रहा था। लगातार तीन विधानसभा चुनाव व लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भी उनकी अगुवाई में जनता को तुच्छ समझने की गलती नहीं की गई, जैसे ही मोदी-शाह युग का अभ्युदय हुआ देश के साथ ही सूबे के भी भाजपाइयों की चाल, चरित्र व चेहरा में व्यापक बदलाव आ गया। बदलाव ऐसा कि सूबे की शांत भाव वाली जनता को यह नागवार गुजरने लगा। यहां की जनता आक्रोशित नहीं होती। वो वक्त का इंतजार करती है। विधानसभा चुनाव में मौका मिला और भाजपा के अहंकार को चूर-चूर कर दिया। सूबे में भाजपा का कांग्रेस ने ठीक वैसे ही सफाया किया जैसे वर्ष 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने किया था। तब अरविंद केजरीवाल की आंधी में भाजपा विपक्ष का नेता बनाने की हैसियत भी हासिल नहीं कर पाई। छत्तीसगढ़ में मामला थोड़ा भिन्न है। यहां कांग्रेस में केजरीवाल की तरह करिश्माई नेता नहीं है। तब मोर्चे पर खुद जनता आई और लड़ाई लड़ी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व उनकी टीम की मेहनत को कमतर नहीं मान रहे, लेकिन यह सच है छत्तीसगढ़ में चुनाव यहां की जनता ने लड़ा और जीत भी उन्हीं की हुई। यदि ऐसा न होता तो बालोद जिले के गुंडरदेही विधानसभा
क्षेत्र से कुंवर निषाद जैसा अति सामान्य व्यक्ति पूर्व सांसद ताराचंद साहू के बेटे दीपक साहू व निवृतमान हो रहे जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के धनिक प्रत्याशी राजेंद्र राय को अर्थाभाव के बाद भी मात देने में सफल न होते। उनके लिए वहां की जनता ने चुनाव लड़ा। इसीलिए कुंवर निषाद नामचीन व दिग्गज नेता की तरह 55 हजार 958 वोटों से जीतने में सफल रहे।

SHARE

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *