पिटे मोहरों पर भाजपा का दांव…..

Ranjit Pandey

रायपुरcgbharatbhuminews.com। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथों धोबी पछाड़ खाने के बाद भाजपा पिछले छह लोकसभा चुनावों के ट्रैक रिकार्ड को बरकरार रखने की कोशिश आरंभ कर दी है। ज्ञात हो वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव से लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव तक भाजपा सूबे में परचम लहराती रही है। इस बार विधानसभा चुनाव में जिस तरह से पराजय हुई इससे भाजपा के लिए ट्रैक रिकार्ड को बनाए रखना आसान नहीं है। फिर सामने चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे तुरुप का वह भी हुकुम का एक्का ही क्यों न हो।

दरअसल, विधानसभा चुनाव में जिस तरह से कांग्रेस की जीत व भाजपा की पराजय हुई इससे पार्टी के नेता हतप्रभ हैं। वे लोकसभा चुनाव के लिए दांव संभल कर खेलने के बजाय गुटबाजी के तहत कदम उठा रहे हैं। इधर मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से एक माह पूरे होने तक जिस तरह से भूपेश बघेल ने सूबे के सबसे बड़े किसान वर्ग की झोली भरी है। इसका कोई तोड़ भाजपा के पास नहीं है। अभी सूबे की जनता भूपेश बघेल सरकार से गदगद है। इससे नहीं लगता कि भाजपा अपना ट्रैक रिकार्ड बरकरार रख पाएगी। इसके बाद भी हार न मामने का गुण भाजपा में गजब का है।

इसी कड़ी में बुधवार को चुनावी फतह के लिहाज से लकी मान कर चलने वाले एकात्म परिसर में शीर्ष भाजपा नेताओं ने प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक ली, इसमें राष्ट्रीय अधिवेशन में मिले कार्यक्रमों पर अमल करने पर चर्चा तो की ही गई लोकसभा चुनाव की तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी तीन पूर्व मंत्रियों को सौंपी गई। चुनावी जंग जीतने के मकसद से सूबे के 11 लोकसभा क्षेत्रों को तीन क्लस्टर में विभक्त किया गया है। रणनीतिक लिहाज से यह अच्छा कदम है लेकिन जिन नेताओं को कमान सौंपा गया है, इसे लेकर अंदरूनी तौर पर भाजपा में सवाल उठ रहे हैं। तीनों ही क्लस्टर का प्रभार अमर अग्रवाल, राजेश मूणत व केदार कश्यप को सौंपा गया है। ये तीनों ही हाल के विधानसभा चुनाव में बड़े अंतर से पराजित हुए हैं। इसका सीधा अर्थ है ये खुद के चुनावी रणनीति कारगर नहीं बना सके और पराजित हो गए।

ऐसे में ये कैसे लोकसभा चुनाव में जीत का परचम फहरा पाएंगे। सवाल यह है जो नेता खुद एक विधानसभा क्षेत्र का चुनाव न जीत सके वे भला 16 से लेकर 40 विधानसभा क्षेत्रों के लिए किस तरह से विजयी रणनीति बना सकेंगे? अमर अग्रवाल ऐसे नेता हैं जो विधानसभा चुनाव में लंबी पारी खेल कर चुनाव जीतते रहे लेकिन अपने राजनीतिक पारी में कभी भी बिलासपुर व गृह नगर खरसिया से आगे नहीं निकल सके। बिलासपुर विधानसभा क्षेत्र की सरहद से लगे कोटा, तखतपुर जैसे विधानसभा क्षेत्रों तक में पकड़ नहीं बना सके फिर वे कैसे पांच लोकसभा क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशियों की चुनावी नैय्या पार लगा पाएंगे? उनके क्लस्टर में पांच लोकसभा क्षेत्र बिलासपुर, कोरबा, जांजगीर-चांपा, रायगढ़ व सरगुजा है। इनमें से किसी भी लोकसभा क्षेत्र में वे बतौर मंत्री के रूप में धमक नहीं बना सके। यदा कदा वे अपने धुर विरोधी भाजपा के ही एक बड़े नेता को जमीन सुंघाने प्रयास करते रहे।

इसमें भी खाास सफलता नहीं मिली। दूसरे क्लस्टर के मुखिया राजेश मूणत हंै। वे कभी भी संगठन के मंझे हुए नेता नहीं रहे हैं। उनकी भी सियासत कमोबेश अमर अग्रवाल की तरह है। राजधानी रायपुर की राजनीति करने के बाद भी अपने विधानसभा क्षेत्र के दायरे से बाहर न निकल सके, जबकि उनको उड़ान भरने पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पूरा आसमान दिया था, लेकिन वे उड़ान न भर सके। पर्दे के पीछे उनको भाजपा के सबसे बड़े जनाधार वाले नेता बृजमोहन अग्रवाल से भिडऩे मैदान में छोड़ा गया, इसमें भी वे सफल नहीं रहे। उनके क्लस्टर में रायपुर, दुर्ग, राजनांदगाव व महासमुंद लोकसभा क्षेत्र को रखा गया है। मूणत अनेक जिलों के प्रभारी मंत्री बनने के बाद भी किसी जिले में कोई छाप नहीं छोड़ सके। सर्किट हाउस तक सीमित रह कर खुद को हाईप्रोफाइल नेता की छवि तक सीमित रखे रहे।

तीन चुनाव वे खुद की वजह से नहीं बल्कि उपजे समीकरणों चलते जीतते रहे। उनके क्लस्टर वाले किसी भी लोकसभा क्षेत्र में उनकी पकड़ नहीं है। आदिवासी नेता व लगातार पंद्रह साल से मंत्री रहे केदार कश्यप को बस्तर व कांकेर लोकसभा क्षेत्र का क्लस्टर प्रभारी बनाया गया है। केदर लगातार सत्ता के चरम में रहने के बाद भी न तो अपनी पहचान प्रखर नेता बलिराम कश्यप के बेटे के रूप में करा पाए और न ही आदिवासियों के खैरख्वाह बन सके। यहां तक कि बस्तर के प्रमुख नेता के रूप में भी पहचान नहीं बना सके जबकि बस्तर का सियासी मैदान उनके पिता बलिराम कश्यप के दिवंगत होने बाद से खाली है। लब्बोलुआब यह है कि भाजपा लोकसभा चुनाव में फतह हासिल करने जिन मोहरों पर दांव खेला है वह पिटे हुए हैं। इससे ढोल तो पीटा जा सकता है लेकिन जीत की राह आसान नहीं है।

भाजपा अपने विधानसभा चुनाव जीतने वाले विधायकों अथवा मौजूदा सांसदों के हाथों रणनीतिक कमान सौंपने के बजाय चुनावी रेसकोर्स के मैदान में हारे हुए मोहरों को लेकर उतरने जा रही है। इनकी सफलता के बारे में अभी से कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती लेकिन ये पार्टी के शीर्षस्थ नेता नरेंद्र मोदी को फिर प्रधानमंत्री बनवाने में सहायक हो पाएंगे इसमें संदेह है। रेसकोर्स का मैदान चाहे व घोड़ों की दौड़ का हो अथवा सियासत में सत्ता की बाजी मारने रणनीतिकार हमेशा तेजतर्रार घोड़ों पर हीं दांव लगाने का चलन रहा है। भाजपा इससे इतर कुछ और दांव लगाने जा रही है।

भाजपा के पास चुनावी प्रबंधन का गुरु डॉ. रमन सिंह, बृजमोहन अग्रवाल, शिवरतन शर्मा जैसे चेहरे हैं। इसके बाद भी इनको मौका नहीं दिए जाने से कहीं न कहीं पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक न होने का अंदेशा जाहिर करता है। यह भी हो सकता है कि गुटीय राजनीति के चलते एक वर्ग को पीछे धकेलने बड़ा गेम प्लान किया जा रहा हो। बहरहाल भाजपा की सियासत के अब असली कुप्रबंधन के उभर कर आने के दिन शुरू हो गए हैं।

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