उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के परिवार वाले सीट पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपना प्रत्यासी नहीं खड़ा करने का किया फैसला

उत्तर प्रदेश के सियासी रण में कांग्रेस को भले ही समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन में जगह न मिली हो, लेकिन जिन सीटों पर इन दलों के पारिवारिक नेता चुनाव में उतर रहे हैं, वहां सब एक-दूसरे पर मेहरबान नजर आ रहे हैं. अब कांग्रेस ने ऐसी ही 6 सीटों पर अपने उम्मीदवार न उतारने का फैसला किया है.

इससे पहले बसपा अध्यक्ष मायावती के साथ गठबंधन की घोषणा करते हुए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रायबरेली व अमेठी सीट कांग्रेस को देने की बात कही थी और इन सीटों पर गठबंधन का उम्मीदवार न उतारने का निर्णय लिया था. कांग्रेस के साथ गठबंधन के सवाल पर अखिलेश यादव लगातार ये कह रहे हैं कि कांग्रेस को दो सीटें दी गई हैं, जो सोनिया गांधी व राहुल गांधी के चुनावी क्षेत्र हैं.

11 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर चुकी कांग्रेस ने भी बड़ा दिल दिखाया है. कांग्रेस ने ऐसी 6 सीटों पर चुनाव न लड़ाने का फैसला किया है, जहां अखिलेश यादव व मायावती खुद चुनाव लड़ेंगे या उनके परिवार से कोई चुनाव लड़ेगा.

माना जा रहा है कि अब कांग्रेस पार्टी ने मैनपुरी, फिरोजाबाद, कन्नौज और आजमगढ़ सीट खाली छोड़ने का फैसला किया है. इन चार सीटों के अलावा अगर मायावती कहीं से लड़ती हैं तो उस सीट पर भी कोई उम्मीदवार नहीं उतारा जाएगा. बता दें कि मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव, कन्नौज से अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव और फिरोजाबाद से रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव चुनाव लड़ने जा रहे हैं.

आजमगढ़ सीट से अखिलेश यादव के लड़ने की चर्चा है. जबकि मायावती ने अभी स्थिति स्पष्ट नहीं की है.

कांग्रेस अपनी पहली लिस्ट में बदायूं सीट से उम्मीदवार का नाम तय कर चुकी है. दिलचस्प बात ये है कि इस सीट से फिलहाल अखिलेश यादव के परिवार से धर्मेंद्र यादव सांसद हैं. ऐसे में अब इस सीट से भी कांग्रेस उम्मीदवार हटाने पर विचार कर रहीं है,

सपा-बसपा परिवार के लिए बड़ा दिखाते हुए कांग्रेस इस बात की भी संभावनाएं तलाश रही है कि जहां उसकी स्थिति जीतने वाली बन सकती है, वहां सपा-बसपा के समर्थन की कोई सूरत बन जाए.

प्रियंका गांधी को यूपी में उतार कर कांग्रेस जिस तेवर से आगे बढ़ी थी, फिलहाल वो नरम पड़ते नजर आ रहे हैं. गठबंधन पर पुनर्विचार के सवाल पर अखिलेश ने ये कहकर भी विराम लगा दिया है कि अब वक्त नहीं बचा है, दोबारा से गठबंधन के लिए मेज नहीं सजाई जा सकती. ऐसे में सपा-बसपा और कांग्रेस अलग-अलग लड़ते हुए ही अंदरूनी तौर पर एक सहमति के साथ बीजेपी के खिलाफ चुनावी रण में उतरने की योजना पर चलती दिखाई दे रही है.

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